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Tuesday, May 01, 2007

Accessibility to Guns: Lets Talk About It

This is the copy of my article published in Collegiate Times at Virginia Tech. To read the article in collegiate times, click here.

After the tragic incident of shooting at Virginia Tech, I heard lots of views in support and against of "Gun Control". As an international student at Virginia Tech, my view is affected by this incident as well as my background. In any case, I think whenever the discussions regarding Gun Control starts, people try to be in support or against of it, the focus of discussion moves to counter other person’s argument and the main issue stays unresolved. While still shocked with the incident, I was listening to a radio show where the host very aggressively said that, if more people had gun in the campus, they would have shot the killer before he could wreak such havoc. Such kind of argument influenced by one line of thought without proper analysis is extremely disturbing.

The major point to discuss here is that Gun Control doesn't mean snatching the gun from every person who has it, it rather means that how to make sure that a weapon like gun which can kill so many people stay with only those people who really have concerns regarding their safety. The current gun law allows the citizens to bear arms for their safety and to fight against tyrannical government. Most of us know today that citizens cannot fight their government today with the kind of weapons citizens can get hold of. As far as safety is concerned, it is a valid point.

Now, to be able to drive a vehicle, a person has to demonstrate his/her ability to handle the car by theoretical and practical tests, because improper use of a vehicle can be dangerous to the person using it and other on the road as well. However, to get the gun you just need a state ID, and you do not have to demonstrate your ability to handle the gun. To get a hunting license, a person needs to pass a test, but to get a gun you do not need to go through any of these formalities. As far as background checks are considered, they are conducted only if you buy gun from a shop, but not if you buy it from a gun fair or from your neighbor.

The guns for hunting and guns for safety should be segregated completely and also the kind of ammunition that can be used in each case. The next point of talk is the availability of ammunition. You all have the idea of the amount of ammunition the killer could buy for this Virginia Tech rampage. For safety, the amount of ammunition needs to be rationed, and extra ammunition should only be supplied if approved by the police. For shooting practice, a person should be able to buy ammunition only at the shooting range and unused ammunition must be returned back to the facility where shooting practice is done.

Now when somebody says that everybody should have gun and that way the society will be safe is a baseless argument Picture this, how safe all the international community and small kids (who cannot have gun, legally) will feel if everybody in Blacksburg had a gun. Now extrapolate it for the whole country. There is a brawl in downtown every other weekend, what would the end result be if everybody had a gun? Personally, I would not like to carry a gun, because I will have to take care of gun's safety more than the safety it will provide to me.

There could be several more arguments in support and against of gun law, but most of the argument are manifestation of people's personal opinion and experience. I think its time to move towards a more non-violent society and enjoy the comfort of safety in non-violence.

I think this is the right time to watch an old movie "Gandhi."

Anurag

Tuesday, January 02, 2007

नए साल की शर्मनाक शुरुआत

बहुत दिन पहले मैंने हम हिन्दुस्तानियों के विनय और आत्मसम्मान की कमी के बारे में चिट्ठा लिखा था। हर कुछ दिन बाद कुछ ना कुछ एसा होता है जो कि मेरी बातों को सच करता है। अब ये मुम्बई की ताज़ातरीन घटना देखिए। नये साल के स्वागत की पार्टी और शराब के नशे में धुत्त लोगों ने एक महिला के लाथ अभद्र व्यवहार किया। कारण कभी क्षणिक उत्तेजना या किसी महिला के भड़काऊ वस्त्र नहीं होते, बल्कि कारण समाज, कानून और महिलाओं के प्रति घटिया और छोटा नज़रिया होना होता है।

जिनमें आशावादिता अब भी है, "उनको नया साल मुबारक हो।"

Tuesday, November 21, 2006

धर्म, भगवान, धर्मांतरण, मैं और आप

पिछले कई सालों से और कई रूपों में मैने इन शब्दों का सामना किया है, मगर इनका मीमांसा करने से बचता ही रहा हूँ। न खुद को समझाने की कोशिश की, ना किसी दूसरे को (कहीं उसकी "धार्मिक" भावना को ठेस ना लग जाए)।

ये विचार मेरे मन में लेकिन कई तरह से आते ही रहे हैं, तो अब अपनी समझ के अनुसार मैने इनकी विवेचना करने का निर्णय ले ही लिया। आगे बढ़ने से पहले मैं ये साफ कर दूँ कि भगवान पर मेरा पूर्ण विश्वास है और मेरा ये मानना है (जानना नहीं) कि कोई शक्ति है जो कई रूपों और गुणों में सर्वत्र विद्यमान है और हमको चला रही है। इस शक्ति का नाम हम फिलहाल "भगवान" ही मान लेते हैं।

ये भगवान जितना सब जगह है उतना ही हमारे और आपके अंदर है। जब किसी रोते को देखककर आपमें दयाभाव जगता है तो आपके अंदर का भगवान प्रकट हो जाता है। मात्र यही है मेरी और मेरे भगवान की परिभाषा। अहम् ब्रह्मास्मि।

अब आती है भगवान की परिभाषाओं की बात। जहाँ तक मेरा मानना है भगवान (या उसकी परिभाषाएँ) इंसान का आविष्कार हैं, ताकि वह अपनी सीमित दिमाग की समझ से बाहर की चीज़ों को परिभाषित कर सके। ये दुनिया, ब्रह्मांड, जीवन, मृत्यु, प्रकृति आदमी की समझ के बहुत बाहर है, और इंसान हमेशा से इन चीज़ों को समझने की कोशिश करता रहा है। इन्हें समझने के लिए इंसान ने ना सिर्फ भगवान का आविष्कार किया बल्कि उसे शक्ल देने की कोशिश भी कि।

राम, कृष्ण, जीसस ये सब असाधारण व्यक्तित्व और प्रतिभाओं वाले साधारण मनुष्य थे। मगर उनका वर्णन और विवरण करने वाले लेखकों ने, भक्तों ने, अनुयायियों ने इनको महापुरुष और फिर भगवान का रूप दे दिया। यहाँ तक तो फिर भी ठीक था, लेकिन फिर इन महापुरुषों की बातों का अनुपालन करने वालों का एक धर्म का अनुयायी मान लिया गया। संस्कृतियों को धर्म के नाम से बाँट दिया गया और ये तय कर दिया गया कि एक आदमी दूसरे से अलग कैसे है।

धर्म के नाम पर रोटी सेकने वालों की मौज हो गई। इतिहास गवाह है कि बड़े बड़े धार्मिक संस्थान भ्रष्टाचार के गढ़ रहे हैं। धर्म डर दिखाने का एक अच्छा माध्यम भी है, भेंड़चाल से चलने वालों लोगों को चलाने का एक बढ़िया माध्यम भी मिल गया। धर्म को नैतिक आचरण परिभाषित करने का भी जरिआ बना दिआ गया। जो हो गया, सो हो गया, लेकिन सैकड़ों, हजारों साल पहले स्थापित, परिभाषित किए गए नियमों से आज भी समाज को हाँकने का प्रयास किया जाता है। समय के साथ समाज का नियम और आचरण भी बदलते हैं, लेकिन धर्म के तथाकथित ठेकेदार आज भी चाहते हैं कि दुनिया पुराने नियमों के अनुसार आचरण करे और धर्माधिकारियों और भगवान से डरे। जो अपने नियम बनाए और आधुनिक विचारों से चले वो नास्तिक, भ्रष्टाचारी और ना जाने क्या क्या।

कई धर्माधिकारी अपने अनुयायियों पर जोर देते हैं कि वो ज्यादा बच्चे पैदा करें, फिर चाहे पृथ्वी की अतिशय संसाधन दोहन से कमर टूटती है तो टूटती रहे, लेकिन "मेरे जैसा धर्म" मानने वाले की संख्या बढ़ती रहे। कई धर्माधिकारी कपड़े पहनने के नियम भी परिभाषित करते हैं, फिर चाहे पहनने वाले की मर्ज़ी हो या ना हो। कुछ जगह तो संसर्ग करने के नियम भी तय किए जाते हैं। हर इंसान अपनेआप में अलग है, उसे कम से कम अपना निजी जीवन खुद निर्धारण करने का अधिकार तो होना ही चाहिए।

जिस तरह धर्म एक गोरख़धंधा है, और भ्रष्टाचार करने वालों के लिए एक अच्छा माध्यम है, और उसी तरह से धर्मांतरण भी एक गोरख़धंधा है। आपकी वफादारी "एक तरह के भगवान" से "दूसरे तरह के भगवान" में बदलने की कोशिश की जाती है। काफी पैसा भी इसमें बनता है, बड़े बड़े दान मिलते हैं, और समाजसुधार का ढोंग भी होता है। खैर...

सबसे मजेदार बात ये है कि धर्म का ये गोरखधंधा अरबों लोगो को चला रहा है और धर्म करोड़ों लोगो की असमय मौत का कारण रहा है। दुनिया आज भी धर्म के नाम पर बँटी हुई है और आज भी कई लोगों की मौत का कारण धर्म ही है।

कभी कभी सोचता हूँ कि अगर दुनिया में धर्म ही नहीं होता तो कैसा होता...

अनुराग

Wednesday, October 25, 2006

ह्रि्तिक बनाम सुरेश

आज IBNLIVE पे ये दो खबरें एक साथ देखीं। एक ह्रि्तिक की और एक और सुरेश की।

ह्रि्तिक और सुरेश में मात्र इतनी समानता है कि दोनो भारत के एक ही क्षेत्र, विदर्भ से हैं।अब असमानताएँ। ह्रि्तिक को तीन फिल्मों में काम करने के मिल रहे हैं ३५ करोड़, और १० साल के सुरेश के किसान पिता ने ५० हज़ार के कर्ज से परेशान होकर आत्महत्या कर ली। हि्तिक अब सबसे ज्यादा पैसा लेने वाले हिन्दी सिनेमा के कलाकार हैं। सुरेश के पिता उन ४१० लोगो में हैं जिन्होने आदरणीय प्रधानमंत्री की विदर्भयात्रा और आश्वासन के बाद आत्महत्या की। सुरेश पढ़ाई छोड़ कर अब खेती करता है, और उम्मीद कर रहा है कि सरकार की तरफ से आत्महत्या कर चुकने वाले किसानों के परिवारों को जो १ लाख रुपए मुआवज़े का वादा है, वो मिल जाए। सुरेश के पिता की आत्महत्या, पिछले कुछ घंटों मे हुई कई आत्महत्याओं में से एक थी।

ये है भारत का ताज़ा छायाचित्र। असमान प्रगति।

मगर यहीं रुकने की आवश्यकता नहीं है। विदर्भ में मरने वालों की संख्या कुल मिला के हज़ार से ऊपर ही है, ये ४१० का नंबर आदरणीय प्रधानमंत्री जी की विदर्भयात्रा के बाद का है। यही हाल उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड का भी है। कष्टदायक बात ये कि सरकार की तरफ से किसानों को मिलने वाली मुआवज़े की रकम होती है, २ रू, ५ रू, १२ रू, जिनको बैंक में जमा कराने के लिए ५०० रू का अकाउंट खोलना पड़ता है।

देखतें हैं कितनी और आत्महत्याओं के बाद बहुत बड़े अर्थशास्त्री हमारे प्रधानमंत्री की आँखें खुलती हैं। राज्य सरकार से तो खैर उम्मीद ही कुछ नहीं है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को फिल्मी पार्टियों से ही फुर्सत नहीं है।

प्रयास करूँगा कि इस बार अपने रेडियो कार्यक्रम में इस पर चर्चा कर सकूँ, और किसी विश्वसयनीय स्रोत से कुछ छोटी मदद कर सकूँ जोकि भारत सरकार के दो रुपए से ज्यादा ही होंगे।

अनुराग

Sunday, June 04, 2006

विनय ओर आत्मसम्मान की कमी

पिछले चिट्ठे में मैंने भारत में बढ़ती कई समस्याओं की तरफ एक साथ ध्यान दिलाने का प्रयास किया था
। हम सब अपनी तरफ से इनके हल समझने और सुलझाने का प्रयास करते हैं। ये चिट्ठा मेरी तरफ से इस
दिशा में एक कदम है।

मेरा मानना है की हमारी आधी से ज्यादा समस्याओं का कारण है हममें विनय और आत्मसम्मान की कमी।
आप किसी भी समस्या के मूल में जाएंगे तो आपको इस बात का एहसास होगा की...

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